पानी के बिना कैसे जीवित रहता है कंगारू रैट?


पानी के बिना कैसे जीवित रहता है कंगारू रैट?

👉 क्या आपको मालूम है कि कोई ऐसा जीव भी होता है जो जिंदगी भर बिना पानी के जीवित रह सकता है ? ऐसा विचित्र जीव है उत्तरी अमेरिका के दक्षिण-पश्चिम रेगिस्तानों में पाया जाने वाला कंगारू रैट । इसकी टांगें और पूंछ कंगारू से मिलती जुलती है । इसके गालों के बाहर की तरफ थैलियां भी होती हैं । इन थैलियों में यह खाने का सामान लाकर बिल में एकत्र करता है, इसीलिए इसे कंगारू रैट कहते हैं। यह कंगारू की तरह लंबी छलांगें लगा सकता है और बहुत तेज गति से भाग सकता है। छलांग के समय अपनी लंबी पूंछ का उपयोग कर यह बीच हवा में ही दिशा बदल सकता है। अब सवाल यह है कि यह बिना पानी पिए जीवित कैसे रहता है ? दरअसल इस चूहे को पानी की बहुत कम आवश्यकता होती है और यह अपनी इस आवश्यकता को भी रेगिस्तान में उगने वाले पेड़-पौधों की जड़ों को खाकर पूरी कर लेता है। रैट कंगारू का गुरदा इतना मजबूत होता है कि वह इस नमी से ही शरीर की पानी की आवश्यकता को पूरी कर लेता है।

ट्यूब से रोशनी क्यों पैदा होती है?

👉 आदिकाल से ही मनुष्य अंधकार को दूर भगाने के लिए प्रकाश पैदा करने का कोई न कोई साधन जुटाता रहा है। उसके बाद उसने मोमबत्ती और तेल के दीपकों का इस्तेमाल करना शुरू किया। वर्तमान में ट्यूब लाइट का बहुतायत में प्रयोग किया जा रहा है। क्या आप जानते हैं कि घरों में लगी ट्यूब से रोशनी क्यों पैदा होती है? दरअसल रोशनी पैदा करने के लिए घरों में काम आने वाली ट्यूब कांच की एक नली होती है। इस नली के अंदर की दीवारों पर किसी उपयुक्त प्रतिदीप्त पदार्थ की तह चढ़ा दी जाती है। प्रतिदीप्त पदार्थ वे हैं, जो आंखों को न दिखने वाली पराबैंगनी किरणों को प्रकाश में बदल देते हैं। इसके दोनों सिरों पर टंगस्टन धातु के दो इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं । नली के अंदर की हवा निकालकर थोड़ा सा पारा और आर्गन गैस भर दी जाती है। जब इन इलेक्ट्रोडों का संबंध विद्युत धारा से किया जाता है, तब ये गरम हो जाते हैं और इनसे इलेक्ट्रॉन निकलने लगते हैं। ये इलेक्ट्रॉन पारे के परमाणुओं से टकराते हैं, जिसके फलस्वरूप आंखों को न दिखाई देने वाला
पराबैंगनी प्रकाश पैदा होता है। जब यह पराबैंगनी प्रकाश कांच की नली पर लगे पदार्थ से टकराता है, तब उससे प्रकाश निकलने लगता है।

हम सांस क्यों और कैसे लेते हैं?

👉 सभी प्राणी जीवित रहने के लिए सांस लेते हैं। अलग अलग जीवधारियों में सांस लेने का तरीका अलग-अलग होता है। कुछ प्राणी नाक से, तो कुछ त्वचा से सांस लेते हैं। मनुष्य नाक द्वारा सांस लेता है। सांस द्वारा ली गई ऑक्सीजन रक्त द्वारा सारे शरीर में पहुंचती है। इसी ऑक्सीजन के द्वारा भोजन के पदार्थ ऑक्सीकृत होते हैं। ऑक्सीजन की क्रिया के फलस्वरूप कार्बन डाइऑक्साइड, पानी और दूसरे पदार्थ पैदा होते हैं। सांस निकालते समय यही कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प बाहर निकलती है। ऑक्सीकरण की क्रिया द्वारा उष्मा और ऊर्जा पैदा होती है। इसी ऊर्जा के द्वारा हम काम करते हैं। उष्मा ऊर्जा के कारण हमारे शरीर का तापमान स्थिर रहता है।
ऑक्सीकरण में पैदा होने वाली ऊर्जा से ही सारे दिन मांसपेशियां काम करती रहती हैं। जब हम व्यायाम या और कोई कठिन काम करते हैं तो हमें अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। अधिक ऊर्जा पैदा करने के लिए हमें अधिक ऑक्सीजन की जरूरत होती है। यही कारण है कि व्यायाम या परिश्रम वाले काम करते समय हम अधिक ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए तेजी से सांस लेते हैं। सांस लेने की क्रिया मस्तिष्क में स्थित श्वास-प्रश्वास केंद्रों से नियंत्रित होती है।

मुंह से आवाज कैसे पैदा होती है?

👉 सभी प्राणियों में सिर्फ मानव ही ऐसा है, जो अपने भावों को बोलकर अभिव्यक्त कर सकता है। जरूरत के अनुसार उसकी आवाज तेज या धीमी हो सकती है। वह जितने कर्कश स्वर में चीख सकता है, उतने ही मधुर स्वर में गा भी सकता है। क्या आप जानते हैं कि आवाज कैसे पैदा होती है?
आवाज पैदा करने में एक खोखले अंग ध्वनि बॉक्स या लेरेंक्स की काफी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जो कि श्वसन नलिका का एक उभरा हुआ हिस्सा होता है। इसकी दीवारें उपास्थि की बनी होती हैं। इस बॉक्स के अंदर म्यूकस झिल्ली होती है और इसके दोनों ओर दो वोकल कार्ड होते हैं। प्रत्येक
कार्ड की गति नियंत्रित करने का काम 16 मांसपेशियां करती हैं। ये मांसपेशियां ही कार्ड को ढीला रखने या कसने का काम करती हैं। फेफड़ों से मुंह में आने वाली हवा जब वोकल कार्ड से गुजरती है, तो ये कंपन करने लगते हैं। इन्हीं कंपनों के कारण आवाज पैदा होती है। ध्वनि का तीखापन, भारीपन और सुरीलापन वोकल कार्ड के तनाव पर निर्भर करता है।

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