बल्ब का आविष्कार  किसने किया ?



थॉमस अल्वा एडिसन। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यह वैज्ञानिक बचपन में मन्दबुद्धि माना जाता था। इनके बारे में स्कूल में कहा जाता था कि उसके दिमाग की बत्ती कभी जलती ही नहीं है। एक दिन ऐसा आया जब उसने अपने दिमाग की बत्ती से बल्ब बना कर लोगों को गलत साबित कर दिया। बल्ब के आविष्कार होने के पहले लोग सोच भी नहीं सकते थे कि सूरज-चाँद के अलावा भी
कोई वस्तु प्रकाशमान हो सकती है। उस समय आग जला कर ही रोशनी की जाती थी। हजार से ज्यादा छोटे-मोटे आविष्कार कर चुके एडिसन ने एक बार बड़े जोश के साथ ढोल पीट दिया कि वह एक ऐसी चीज बनाने जा रहा है, जिससे रात में भी दिन हो जायेगा। लोगों ने इसे थामस अल्वा एडिसन की एक और सनक समझा। लेकिन एडिसन जो एक बार ठान लेते थे, उसे पूरा करने में ही अपने दिन-रात बिताते। कहने को तो एडिसन ने कहा कि बल्ब बनाना बहुत आसान है और वे सिर्फ पन्द्रह दिन में बल्ब बनाकर रात को रोशन कर डालेंगे लेकिन बल्ब का आविष्कार करने में उन्हें
डेढ़ साल लग गये। काँच के गोले को हवा रहित करने के बाद सवाल उठा उसमें लगने वाले महीन
तार (फिलामेन्ट) का, जिसकी चमक से रोशनी निकलती थी। उसे ढूँढना भूसे के ढेर से सुई निकालने जैसा हो गया। फिलामेन्ट के लिए एडिसन ने हरेक बारीक और पतली चीज को आजमाया। एडिसन जो भी आजमाता वह एक पल के लिए चमकता और दूसरे आजमाए। उन्होने बल्ब बनाने के लिए दस हजार से ज्यादा कोशिशें की। एक बार तो उन्होंने दाढ़ी के बाल को भी फिलामेन्ट के रूप में इस्तेमाल कर डाला। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

आखिरकार एडिसन ने पहला बल्ब कपास के एक बहुत महीन धागे को फिलामेन्ट के रूप में इस्तेमाल करके बनाया। यह बल्ब एक बार में डेढ़ दिन तक जला। अब बल्ब में टंगस्टन का फिलामेन्ट लगाया जाता है जो सालों तक चलता है। अँगुली के एक इशारे पर जल उठने वाला बल्ब दिखने में भले ही छोटा लगे लेकिन इसने हमारी दुनिया को बदल दिया है। इसके बाद तो पीली रोशनी से दूधिया रोशनी तक बल्ब ने एक लम्बा सफर तय किया। अल्ट्रावॉयलेट बल्बों की मदद से जहाँ जमीन के अंदर पानी का पता लगाया जाता है वहीं मशहूर कलाकृतियों की जालसाजी का भी पता लगाया जा सकता हैं आखिरकार बल्ब बनाकर थॉमस अल्वा एडिसन ले आए ना..... तारे जमीं पर।

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