गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स पुस्तक का नाम अब लोगों के लिए अनजाना नहीं है।



गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स पुस्तक का नाम अब लोगों के लिए अनजाना नहीं है। हर साल इसमें कुछ न कुछ नये रिकॉर्ड दर्ज होते हैं। इसमें ऐसे-ऐसे तथ्य होते हैं कि पढ़कर दाँतों तले अंगुली दबानी पड़ जाती है।

सन् 1951 की बात है। आयरलैंड का एक धनी व्यक्ति सर ह्यू बीपर दोस्तों के साथ बयान नामक चिड़िया का शिकार करने निकला था। एकाएक उसकी आँखों के सामने से चिड़िया का झुंड इतनी तेजी से निकल गया कि वे लोग कुछ नहीं कर सके। यह देखकर ह्यू बीपर और उसके दोस्तों को काफी अफसोस हुआ। शिकार से खाली हाथ लौटने के बाद सब इसी बहस में उलझे थे कि क्या बयान पक्षी यूरोप का सबसे तेज उड़ने वाला पक्षी है? बात आई-गयी हो गयी। तीन वर्ष बाद अगस्त 1954 में इस बात पर फिर बहस छिड़ी कि क्या तीतर बयान से भी तेज उड़ने वाला पक्षी है? कई
किताबें पलटने के बाद उन्हें अपनी जिज्ञासा का उत्तर तो मिल गया, पर सर ह्यू के मन में एक बात बैठ गयी कि इस तरह के हजारों लोग होंगे, जो ऐसे प्रश्नों से रोज उलझते होंगे। उस समय ऐसी कोई किताब भी नहीं थी जिससे इस तरह के प्रश्नों के उत्तर आसानी से मिल जाते।

सर ह्यू के दोस्तों में नोरस और रास मैक हिवरटर दो भाई थे। वे लंदन में एक न्यूज एजेंसी चलाते थे, जिसका काम समाचार-पत्रों द्वारा पूछी गयी जिज्ञासाओं का उत्तर देना था। सर ह्यू ने उनसे मिलकर इस बात पर विचार-विमर्श किया कि क्यों न ऐसी किताब लिखी जाय, जिससे इन सभी जिज्ञासाओं के उत्तर मिल सकें। बात दोनों भाईयों की समझ में आ गयी। उन्होंने अपनी एजेंसी में उपलब्ध साधनों की सहायता से 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉडर्स' नामक एक पुस्तक तैयार की। जो अगस्त, 1955
में प्रकाशित हुई।

सन् 1974 में इस पुस्तक का नाम भी रिकॉर्डों में दर्ज किया गया, क्योंकि इस वर्ष इसकी 2 करोड़ 39 लाख प्रतियां बिक चुकी थीं। आज यह पुस्तक विश्व के कम से कम 26 भाषाओं में प्रकाशित होती है। पहले इसके संपादक अपने मित्रों-परिचितों से पूछकर तथा अन्य पुस्तकों तथा अखबारों को पढ़कर रिकॉर्ड्स दर्ज करते थे। जैसे-जैसे इस किताब के सम्बन्ध में लोगों को मालूम हुआ तो वे खुद ही संपादकों के पास इस तरह की सूचनाएँ भेजने लगे।

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