कराटे का इतिहास 



'कुंग-फू' का नाम लेते ही हमारे मस्तिष्क में एक ऐसे दुबले पतले पहलवान की तस्वीर उभरती है
जो अपने हाथ, पैर, पीठ एवं सिर के बल एक वक्त में दस-दस आदमियों से मुकाबला करता है और कई बार उन्हें घायल भी कर देता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आज से दो हजार वर्ष पूर्व इसकी शुरूआत चीन में हुई थी, जबकि भारतीय लोगों की धारणा है कि भारत के योद्धाओं ने 'कुंग-फू' की तकनीक का विकास किया।
वैसे 'कुंग-फू' दूसरे पर आक्रमण, मजबूत पकड़ व फेंक की कला का ही नाम है। चीन के एक बौद्ध मंदिर के शिलालेख के अनुसार 520 ई. पूर्व बोधिधर्म नाम का एक भिक्षु चीन आया। उसने यहाँ के भिक्षुओं को योग की कला सिखाई, जिससे दिमाग और शरीर पर नियंत्रण रखा जा सके। इस तरह चीन के भिक्षुओं ने बोधिधर्म के योग की कला और अपनी लड़ाई की कला को मिश्रित करके इसे
शओलिन 'कुंग-फू' नाम दिया।
सन् 1276 में कुछ चीनी भिक्षुओं ने प्रशांत महासागर के एक द्वीप ओकिनावा की यात्रा की और वहाँ के लोगों को 'कुंग-फू' का प्रशिक्षण दिया। वहाँ के लोगों ने अपनी युद्धकला 'टोड' को 'कुंग-फू' में मिश्रित कर दिया। उन लोगों ने इसे 'ओकिना वान्ते' का नाम दिया गया। बाद में यही कला विकसित होकर संसार में 'कराते' के नाम से चर्चित हुई। वैसे इस कला को अंग्रेजी में 'कराटे' भी कहते हैं। ओकिना वान्ते का अर्थ है - 'हाथ की शक्ति का कमाल।'

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