कम्पास आविष्कार का इतिहास 



चुम्बकीय कम्पास के आविष्कारक का नाम तो कोई नहीं जानता परन्तु कुछ सुराग सुझाते हैं कि चीनी लोगों को ऐसे 'लोडस्टोन' की जानकारी थी जो पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति से प्रभावित होकर
समतल दिशाओं की जानकारी दे सकता था। 83 ईस्वी की एक चीनी पुस्तक में एक विशेष उपकरण का उल्लेख मिलता है। इस उपकरण में चुम्बकीय लोहे से बने एक चम्मच को कांसे की एक चौकोर
तश्तरी पर लगाया जाता था। चम्मच की हत्थी से दिशा का पता लगाया जाता था। कुछ पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इससे भी पहले ईसा पूर्व चौथी सदी में 'साऊथ प्वायंटर' नामक एक यंत्र नाविकों द्वारा दिशा निर्धारण के लिए इस्तेमाल किया जाता था। यह भी माना जाता है कि 'लोडस्टोन' का इस्तेमाल 'साऊथ प्वायंटर' से पहले घरों के प्रवेश द्वार की सही दिशा निर्धारित करने के लिए किया जाता था ताकि घर उसमें रहने वालों के लिए सौभाग्यशाली बन सके।

12 वीं सदी में चीनी नाविकों द्वारा समुद्री यात्रा के दौरान पहली बार चुम्बकीय कम्पास का इस्तेमाल किया गया। इस समय तक कम्पस एक विकसित यंत्र बन चुका था। अब इसमें एक चुम्बकीय सुई पानी से भरी डिबिया में तैरती नजर आती थी। 12वीं सदी के अन्त तक कम्पास का इस्तेमाल यूरोपीय देशों में भी होने लगा था।

13 वीं सदी तक एक फ्रांसीसी वैज्ञानिक पेटरस पेरेग्रिनस ने विभिन्न दिशाओं को दर्शाते बिन्दुओं वाले आधुनिक कम्पास कार्ड का आविष्कार कर लिया था। यह कार्ड कम्पास की डिबिया के निचले हिस्से में रखा जाता था तथा इसके ऊपर चुम्बकीय सुई लगाई जाती थी ताकि दिशाओं को सरलता से पढ़ा जा सके।

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